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भगत सिंह क्यो एक भंगी को मा कहते थे

 #अद्वितीय_भगतसिंह!




भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले भंगी का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे। जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये भंगी बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ? तब भगत सिंह कहते, "मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस भले पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।"


यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेते।


भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, "बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ" पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, "भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार और मैं एक अदना सा भंगी। भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।"


सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे। फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा, "बेबे, अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!"


बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद-ए-आजम के लिए रोटियां बनाईं और अपने हाथों से ही खिलाई। 


भगत सिंह के मुंह में रोटी का गास डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी, "ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया।" 


भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाहों में भर लिया।


ऐसी सोच के मालिक थे अपने वीर सरदार भगत सिंह जी...। परन्तु आजादी के 70 साल बाद भी हम समाज में व्याप्त ऊँच-नीच के भेद-भाव की भावना को दूर करने के लिए वह न कर पाए जो 88 साल पहले भगत सिंह ने किया। 


महान शहीदे-आजम को हम सबका सलाम 

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Comments

  1. Wo sahide aajam aise he nhi bne unhone apne krm se apne naam ko sahide aajam banaya

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