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कर्ण ये गलती ना करता तो........! Full story of karna in mahabharat war

 
कर्ण
कर्ण



महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा और अंतिम दिनों में कौरवों की सेना के सेनापति कर्ण अपनेप्रतिद्वंदी अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर थे जिसकीतारीफ भगवान श्रीकृष्ण ने भी की। लेकिनकहते हैं कि कुसंगत काअसर बहुत घातक होता है। बहुत कम लोग ही होते हैं जो कमल के समान होते हैं। इस कुसंगत के चलते ही कर्ण कई बार गलतियां करते गए। उनकी इन्हीं गलतियों ने कौरवों और पांडवोंके युद्ध में उनको कमजोर बना दिया था। 

महाभारतयुद्ध में कर्ण सबसे शक्तिशाली योद्धा माने जाते हैं। कर्ण को किस तरह से काबू में रखा जाए, यह कृष्ण के लिए भी चिंता का विषय हो चला था। लेकिन कर्ण दानवीर, नैतिक और संयमशील व्यक्तिथे। ये तीनों ही बातों उनके विपरीत पड़ गईं।
Karna-mahabharat
Karna-mahabharat


कर्ण के बारे में सभी जानते हैं कि वे सूर्य -कुंती पुत्र थे। उनके पालक माता-पिता का नाम अधिरथ और राधा था। उनके गुरु परशुराम और मित्र दुर्योधन थे। हस्तिनापुर में ही कर्ण का लालन-पालन हुआ। उन्होंने अंगदेश के राजसिंहासन का भार संभाला था। जरासंध हो हराने के कारण उनको चंपा नगरी का राजा बना दिया गया था। 

ब्रह्मास्त्र : उस काल में द्रोणाचार्य, परशुराम और वेदव्यास को ही ब्रह्मास्त्र चलाना और किसी के द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किए जाने पर उसे असफल कर देना याद था। उन्होंने यह विद्या अपने कुछ खास शिष्यों को ही प्रदान की थी। उसमें भी किस तरह ब्रह्मास्त्रको असफल करना, यह कम ही शिष्यों को याद था। 

जब द्रोणाचार्य ने कर्ण के सूत पुत्र होने को जानकर ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वे परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था। 

कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम ने ब्रह्मास्त्र के अलावा कर्ण को अन्य सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी। 

फिर एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और वह कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया। लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा। 

बहते खून ने जब परशुराम को छुआ तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं? कर्ण ने कहा कि आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। सच-सच बताओ। तब कर्ण ने सच बता दिया। 

क्रोधित परशुराम ने कर्ण को उसी समय शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे। 

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यदि वह झूठ नहीं बोलता तो सच बताकर क्या परशुराम उसे विद्या सिखाते? नहीं सिखाते...। तब वे किससे सीखते? निश्‍चित ही यह भूल थी लेकिन भूल नहीं भी थी। 


कर्ण के माता पिता का क्या नाम था
कर्ण के माता पिता का क्या नाम था

कवच और कुंडल : भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल है, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, वह युद्ध में अजेय रहेगा। 

तब कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय बताया और फिर देवराज इन्द्र एक ब्राह्मण के वेश में पहुंच गए कर्ण के द्वार। देवराज भी सभी के साथ लाइन में खड़े हो गए। कर्ण सभी को कुछ न कुछ दान देते जा रहे थे। बाद में जब देवराज का नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा-विप्रवर, आज्ञा कीजिए! किस वस्तु की अभिलाषा लेकर आए हैं? 

विप्र बने इन्द्र ने कहा, हे महाराज! मैं बहुत दूर से आपकी प्रसिद्धि सुनकर आया हूं। कहते हैं कि आप जैसा दानी तो इस धरा पर दूसरा कोई नहीं है। तो मुझे आशा ही नहीं विश्‍वास है कि मेरी इच्छित वस्तु तो मुझे अवश्य आप देंगे ही।‍ फिर भी मन में कोई शंका न रहे इसलिए आप संकल्प कर लें तब ही मैं आपसे मांगूंगा अन्यथा आप कहें तो में खाली हाथ चला जाता हूं? 

तब ब्राह्मण के भेष में इन्द्र ने और भी विनम्रतापूर्वक कहा-नहीं-नहीं राजन! आपके प्राण की कामना हम नहीं करते। बस हमें तो आपका कवच और कुंडल चाहिए
ओर कर्ण ने अपना कवच और कुंडल उन्हें दे दिया 

अगर कर्ण ये गलती ना करता तो उन्हें महाभारत युद्ध में कोई हराने वाला नहीं था

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