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जब एक तरबूज के लिए हुआ था युद्ध जानिए उस युद्ध की पूरी कहानी matire ki raad

तरबूज की लड़ाई कब और किसके साथ हुई/ Tarbuj ki ladai
मतीरे की राड़ कब और किसके साथ हुई ( Matire ki raad)

नमस्कार दोस्तों आज के ब्लॉग में हम दो राज्यो की ऐसी लड़ाई के बारे में जानेंगे जो कि तरबूज के कारण हुई थी जी हा चौक गए ना  में भी ऐसे ही चौंक गया था जब इसके बारे मैं पढ़ा था मगर ये सत्य है तो चलिए शुरू कर है अपनी कहानी 
मातिरे की राड कब और किसके साथ हुई तरबूज की लड़ाई कब और किसके साथ हुई
मातिरे की राड कब और किसके साथ हुई तरबूज की लड़ाई कब और किसके साथ हुई

तो दोस्तो बात है सन 1644 की जब राजपूताना के बीकानेर रियासत के महाराज थे कर्ण शिंह ओर नागौर रियासत के महाराज थे अमर सिंह राठौड़ !
तो दोस्तो नागौर रियासत का एक गांव था जोखनिया !और जोखनीया गांव के साथ में ही दूसरे गांव की सीमा भी लगती थी और वो दूसरा गांव था खिलवा ! और खिलवा गांव बीकानेर रियासत में आता था 



अब हुआ ये की जोखनिया गांव की एक तरबूज की बेल फैलती फैलती खिलवा गांव में चली गई और वहां खिलवा गांव में उस बेल पर एक तरबूज लग गया अब जोखनिया गांव का किसान तो कहने लगा ये तरबूज मेरा है क्योंकि बेल मेरे खेत में लगी है और खिलवा गांव का किसान ने उस तरबूज पर अपना हक जताने लगा क्योंकि तरबूज मेरे खेत में लगा है
Matire ki raad tarbuj ki ladai
Matire ki raad tarbuj ki ladai

झगड़ा फैलता गया दोनों किसानों से वो झगड़ा दोनों गांवों के बीच हो गया और दोनों गांवों के लोगों ने अपनी अपनी रियासत के महाराजाओं को बता दिया और देखते ही देखते ये झगड़ा दोनों रियासतों की सेनाओं के बीच युद्ध का रूप ले लिया इस युद्ध में बीकानेर की सेना का नेतृत्व रामचंद्र मुखिया ने किया जबकि नागौर की सेना का नेतृत्व सिंघवी सुखमल ने किया

अंत में इस युद्ध में बीकानेर  की हार हुई और नागौर की जीत और शांति का समझौता इस बात पर हुआ की ये खिलवा गांव अब नागौर रियासत के अधीन होगा ओर खिलवा गांव नागौर के अधीन हो गया इस लड़ाई को इतिहास में तरबूज की लड़ाई ( Tarbuj ki ladai) या मतिरे की राड़ ( matire ki raad) के नाम से जाना जाता हैं

दोस्तो ये ब्लॉग आपको कैसा लगा जरुर बताए और इसी तरह के अच्छे और जानकारी के ब्लॉग पढ़ना चाहते हैं तो हमारे ब्लॉग को फॉलो करे इस पोस्ट को लाईक शेयर जरुर करें आपका धन्यवाद 

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 तो दोस्तो आज मे हम आपके इन्हीं सवालों के जवाब इस पोस्ट में दूंगा 


मंदोदरी कोन थी :- पुरानी कथाओं के अनुसार बताते है की मंदोदरी एक मेंढकी थी एक समय बात है ! 

सप्तऋषि खीर बना रहे थे उस खीर में एक सर्प गिर गया ये सब मंदोदरी ने देख लिया


 ऋषियों ने नहीं देखा तो मंदोदरी जो कि एक मेंढकी थी वो ऋषियों के देखते देखते उनके खाने से पहले उनकी खीर बना रहे पात्र में गिर गई 


ऋषियों ने ये सब देख लिया तो अब जिस भोजन में अगर मेंढक गिर जाए उसे कोन खाए 


इसलिए उन्होंने उस खीर को फेक दिया जैसे ही उन्होंने खीर को फैका उसमे से मेंढकी के साथ एक सर्प भी निकला 


ऋषियों ने समझ लिया कि इस मेंढकी  ने हमे बचाने के लिए अपने प्राण त्याग दिए उन्होंने मंदोदरी को वापस जीवन दान दिया और एक कन्या का रूप दिया तब से कहा जाता हैं की मंदोदरी सप्तऋषियों की संतान थी


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