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कर्ण को कवच क्यो और कैसे मिला नर नारायण की संपूर्ण कथा

कर्ण को कवच क्यो और कैसे मिला

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नमस्कार दोस्तों आज के इस ब्लॉग में हम बात करेंगे कि कर्ण को कवच क्यो और कैसे मिला दोस्तो इस कथा को समझने से पहले हमे नर नारायण की कथा को समझना जरूरी है


नर नारायण की कथा:- 

त्रेता युग में एक दंबोधव नाम का राक्षस था उसने भगवान सूर्य की कई वर्षों तक तपस्या की भगवान सूर्य उनसे प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा दंबोधव ने कहा हे सूर्य देव मुझे अमरता का वरदान दो

सूर्य देव ने कहा हे पुत्र ऐसा नहीं हो सकता है क्योंकि जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता हैं
तब दंबोधव ने बड़ी चतुराई से कहा ठीक है प्रभु मुझे एक हजार ऐसे दिव्य कवच दीजिए जिनमें हर एक कवच को वो ही तोड़े जो एक हजार वर्षों तक तपस्या करे और उस कवच को तोड़ने के बाद तुरंत ही वो मर जाए सूर्य देव ने उसे ये वरदान मजबूर होकर देना पड़ा क्योंकि सूर्य देव को पता था की ये वरदान भी अमरता से कम नहीं है

अब दंबोधव वरदान प्राप्त करने के बाद पूरे संसार में उत्पात मचाने लगा पूरे संसार में हाहाकार मच गया जल्द ही वह सहस्त्र कवच के नाम से जाना जाने लगा

दूसरी तरफ राजा दक्ष की पुत्री मूर्ति का विवाह बर्मा के पुत्र धर्म के साथ हुआ जब मूर्ति को दंबोधव के बारे मैं पता चला तो वो भगवान विष्णु की तपस्या करने लगी उनकी तपस्या से भगवान प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा तो मूर्ति ने भगवान को पुत्र के रूप में मंगा भगवान ने वरदान दे दिया


कुछ समय बाद मूर्ति को दो पुत्र हुए जिनमें एक का नाम नर और एक का नाम नारायण था दोनों के शरीर अलग थे पर आत्मा एक थी जब दोनों बड़े हुए तो नारायण तो तपस्या करने चला गया और नर दंबोधव से युद्ध करने चला गया

 दंबोधव ने नर से कहा की तुम मुझसे युद्ध करने तो आ गए पर तुम्हे ये नहीं पता कि मेरे पास एक हजार कवच है और उनमें से एक को तोड़ने के लिए तुम्हे एक हजार वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी और ओर फिर भी तुम एक कवच को तोड़ने के तुरन्त बाद ही तुम मर जाओगे नर ने कहा कि  जो होगा देखा जायेगा तुम मुझसे युद्ध करो और दोनों में भीषण युद्ध शुरू हो गया दोनों को युद्ध करते हुए एक हजार वर्ष बीत गए और नर ने उनका एक कवच तोड़ दिया क्योंकि नारायण तपस्या कर रहे थे और दोनों की आत्मा एक ही थी इसलिए नर उनका कवच तोड़ पाए मगर तुरन्त ही मर गए क्योंकि सूर्य देव का वरदान था कि कवच को तोड़ने वाला तुरंत ही मर जाएगा

 नर के मरते ही नारायण वहा आ गए और महामृत्युंजय जप से नर को सजिवन कर लिया अपनी एक हजार वर्षों के तपस्या के बल से और अब नारायण दंबोधव से य युद्ध करने  लगा और  नर  तपस्या करने चला लगा एक हजार वर्ष बाद नारायण ने दंबोधव का दूसरा कवच तोड़ दिया और मर गया नर वहा आकर उसे जिंदा किया ऐसा करते करते नर नारायण ने मिलकर दंबोधव के 999 कवच तोड़ डाले दंबोधव  घबरा गया और सूर्य देव की सरण में चला गया

 सूर्य देव ने उसे नर नारायण से नहीं मारने को कहा तब नर नारायण ने सूर्य देव को श्राप दिया कि जब भी तुम्हारा अंस इस पर्थवी पे आएगा उसके साथ इस राक्षस का अंश भी तुम्हारे साथ आएगा अर्थात तुम्हारा शरीर तो एक होगा आत्मा दो होगी

इसलिए जब कर्ण के रूप में सूर्य देव का अंश आया तब सूर्य देव के अंश के साथ उस राक्षस का अंश भी आया और वही जो उस राक्षस का कवच बच गया था वो ही कर्ण के पास था क्योंकि कर्ण के अंदर सूर्य देव के साथ उस राक्षस का अंश भी था और इस राक्षस के वजह से उसे अधर्म क साथ देना पड़ा था

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